Top Court Break On Bulldozer : हुकूमत के बुलडोजर पर शीर्ष अदालत का ब्रेक….मामला जानने पढ़िए पूरी खबर

Top Court Break On Bulldozer : हुकूमत के बुलडोजर पर शीर्ष अदालत का ब्रेक....मामला जानने पढ़िए पूरी खबर

Top Court Break On Bulldozer : हुकूमत के बुलडोजर पर शीर्ष अदालत का ब्रेक....मामला जानने पढ़िए पूरी खबर

Top Court Break On Bulldozer : हुकूमत के बुलडोजर पर शीर्ष अदालत का ब्रेक….मामला जानने पढ़िए पूरी खबर

Top Court Break On Bulldozer : बुलडोजर यानि एक ऐसी मशीन जो पूरी तरह चली तो सबकुछ नेस्तनाबूद कर देती है।

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Top Court Break On Bulldozer : हालांकि इसका चलन काफी वर्षों से देश में चल रहा है, लेकिन देश के सबसे बड़े

सूबे उत्तर प्रदेश में जब से भाजपा की योगी आदित्यनाथ की सरकार बनी है,

ऐसा कोई दिन नहीं गया होगा कि जब प्रशासनिक अमला बुलडोजर चलाने से चूका हो ?

लोग तो मुख्यमंत्री योगी को अब बुलडोजर बाबा ही कहने लगे हैं।

उत्तर प्रदेश की देखा-देखी कई राज्यों ने की है। मध्य प्रदेश, बिहार

और गुजरात में भी बुलडोजर ने कई अवैध कब्जे नष्ट किए हैं।

और उनका अभियान इन दिनों चल ही रहा है।

इस बीच माननीय सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के हल्द्वानी में रेलवे की

भूमि पर अतिक्रमणकारियों के 4 हजार घरों पर बुल्डोजर चलाने पर रोक लगा दी,

और इसे एक मानवीय मुद्दा करार दिया। इसके साथ ही न्यायालय ने रेलवे

और उत्तराखंड सरकार से जवाब तलब भी किया है। न्यायालय ने यह भी

कहा कि इसका व्यवहारिक समाधान खोजने की सख्त जरूरत है। ऐसा

कर सर्वोच्च अदालत ने मानवीय संवदनाओं की पूरी तरह रक्षा की है।

जो स्वागतयोग्य ही नहीं एक सराहनीय प्रयास भी है। हल्द्वानी में रेलवे

की 29 एकड़ भूमि पर 44 सौ परिवारों के करीब 50 हजार लोग

पिछले सौ साल से भी अधिक समय से बसे हुए हैं। अतिक्रमण का

दायरा सिर्फ 2.2 किलोमीटर है, जिसे उत्तराखंड उच्च न्यायालय के

माध्यम से 10 जनवरी से मुक्त किए जाने का अभियान चलाया जाना था।

अतिक्रमण हटाने के खिलाफ हल्द्वानी में पिछले कई दिनों से लोगों का

भारी विरोध प्रदर्शन चल रहा है। जिसे प्रशासन नजरअंदाज करता आ रहा है।

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अदालत ने उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाते हुए कड़ी टिप्पणी की

कि रातोंरात 50 हजार लोगों को बेघर नहीं किया जा सकता। उसने राज्य

सरकार से लोगों के पुनर्वास के लिए भी कहा है। रेलवे देश भर में अपनी

जमीन अतिक्रमणकारियों के कब्जे से मुक्त करा रही है। ें रेलवे इस भूमि से

बड़े पैमाने पर धन कमाना चाहती है। देश मंे रेलवे के पास कुल 4.81

लाख हेक्टेयर जमीन है और उसमें से 814.55 हेक्टेयर जमीन पर अवैध

कब्जा है। रेलवे की ओर से 871.45 हेक्टेयर पर अलग-अलग वजहों से

मुकदमा चल रहा है। अनाधिकृत कब्जा और पट्टा व लाइसेंस करार की

शर्तों का उल्लंघन, भूमि के स्वामित्व को लेकर विवाद अदालत में लंबित हैं

। रेलवे ने अपनी जमीन का नक्शा बनाकर उसका डिजिटलाइजेशन करने

का काम आरएनडीए को सौंप रखा है। यह एक वैधानिक निकाय है,

वैसे देखा जाए तो रेलवे पटरियों विशेषकर रेलवे स्टेशनों के पहले रेलवे की

जमीन पर गरीबों ने छोटे-मोटे घर बनाकर काफी अरसे से कब्जा कर रखा है।

देर सबेर प्रशासनिक अमला बुलडोजर चलाकर उन्हें बेदखल करता भी है तो

वे दोबारा उस पर कब्जा कर लेते हैं, और आखिर उनका एक ही सवाल होता है

कि हम जाएं तो जाएं कहां ? सरकार हमारे लिए भी कोई वैकल्पिक व्यवस्था

करे तो हम हमेशा के लिए हटने के लिए तैयार हैं। पर न सरकार उनकी सुध

लेती है और न वे इन जगहों से अपने को अलग कर पाते हैं। गरीबों का

रेलवे की भूमि पर अवैध कब्जा कर बस जाना और फिर उन्हें प्रशासनिक

अमलों के जरिए बेदखल करने की कार्रवाई के बारे में यही कहा जा सकता है

कि आखिर हुकूमत इतनी जालिम क्यों हो रही है। इस पर किसी शायर ने

ठीक ही कहा है कि – लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में

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