Chaos in the politics of Delhi MCD: पार्षदों का संघर्ष क्या कुछ कर गया बयां- जानें

Chaos in the politics of Delhi MCD: पार्षदों का संघर्ष क्या कुछ कर गया बयां- जानें

Chaos in the politics of Delhi MCD: पार्षदों का संघर्ष क्या कुछ कर गया बयां- जानें

 

जनधारा 24 पॉलिटिकल डेस्क। Chaos in the politics of Delhi MCD :

दिल्ली में आज छोटी सरकार के मुखिया यानि महापौर, उप महापौर, स्थाई समिति के

सदस्यों का चुनाव होना था, पर राजनीति में जो कुछ हो जाय

वह अपने आप में कम है।

Chaos in the politics of Delhi MCD : आज का छोटा कार्यकर्ता आगे

जाकर एक बड़ा नेता जो बनता है।

दिल्ली नगर निगम के मुख्यालय सिविक सेंटर में आम

आदमी पार्टी और भाजपा के बीच जिस तरह पार्षदों को लेकर हंगामा हुआ

वह इतने तक ही सीमित नहीं रह कर हाथापाई और हमले में तब्दील हो गया।

बेंच पर खड़े होकर भाजपा और आप पार्षदों के बीच

कुर्सी युध्द का नजारा पूरे देश ने देखा।

हमारे जन प्रतिनिधि इतने उग्र हो सकते हैं

यह किसी ने सोचा भी नहीं होगा।

 

Chaos in the politics of Delhi MCD : मेयर के चुनाव के पहले ही हंगामा

मेयर के चुनाव से पहले आप के सदस्यों ने खूब हंगामा किया।

वे पीठासीन अधिकारी के मनोनीत सदस्यों को पहले शपथ दिलाए जाने से नाराज थे।

आप विधायकों ने कहा कि एमसीडी के इतिहास में आज तक कभी सदन में

मनोनीत पार्षदों की पहले शपथ और वोटिंग नहीं हुई।

हुआ ये था कि दिल्ली के एलजी वीके सक्सेना ने अपने अधिकारों

का प्रयोग करते हुए भाजपा की पृष्ठभूमि के 10 सदस्यों

को मनोनीत कर दिया, जिन्हें एल्डरमैन कहा जाता है।

134 सदस्यों वाली आम आदमी पार्टी को राज्यपाल के

मनोनीत व्यक्तियों पर आपत्ति थी। अंततः हंगामे के चलते 10 में से 4 पार्षद

ही एल्डरमैन की शपथ ले सके। इसके एक घंटे बाद फिर सदन की

कार्रवाई शुरू होती, कि दोनो पार्टियों के नेताओं ने

अपना हंगामा बदस्तूर जारी रखा, और कामकाज को आगे बढ़ने नहीं दिया।

 

एमसीडी का सियासी समीकरण

एमसीडी के चुनाव में जहां आम आदमी पार्टी ने 134 सीटें जीती हैं।

वहीं बीजेपी ने महज 104 और कांग्रेस ने 9 स्थानों पर अपनी जीत दर्ज की है।

मेयर के चुनाव में आप ने शैली ओबेरॉय को उम्मीदवार बनाया था

तो बीजेपी ने रेखा गुप्ता पर दांव लगाया है।

स्थाई समिति के 6 सदस्यों का चुनाव भी होना है,

लेकिन आप और भाजपा दोनों ही वर्चस्व की लड़ाई में

अपने कर्तव्यों और जनता से किए वादों को भूल गए हैं।

आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल

ने एलजी सक्सेना पर निशाना साधते हुए कहा कि

संविधान इस तरह सदस्यों को मतदान करने से रोकता है

और उन्हें सदन में वोट दिलाने की कोशिश पूरी तरह असंवैधानिक है।

Chaos in the politics of Delhi MCD : क्या कहते हैं केजरीवाल

केजरीवाल ने कहा एलजी येनकेन प्रकारेण भाजपा को एमसीडी पर कब्जा दिलाना चाहते हैं,

जो कि हम संभव नहीं होने देंगे। भाजपा ने इस पूरे प्रकरण को लेकर

आप पर खून बहाने का आरोप लगाया।

बीजेपी सांसद प्रवेश वर्मा ने कहा कि आप के लोगों ने ब्लेड,

कांच के टुकड़े और नुकीली चीजों से हमला किया

और हमारे लोग चोटिल तक हो गए। इसी लिए

सीसीटीवी फुटेज जारी किया जाना चाहिए,

ताकि ये देखा जा सके कि आज के इस खून-खराबे के

लिए कौन जिम्मेदार है ?

आम आदमी पार्टी ने दावा किया कि उसके दो पार्षद घायल हो गए।

आम आदमी पार्टी के विधायक सौरभ भारद्वाज ने कहा कि

भाजपा बेइमानी से एमसीडी में कब्जा करना चाहती है।

बीजेपी वालों की गुंडागर्दी हम कतई चलने नहीं देंगे।

आप के संजय सिंह ने पलटवार करते हुए कहा कि

भाजपा ने सदन में खूनी खेल शुरू कर दिया है।

इस काम में कांग्रेस का हाथ भी भाजपा के

साथ दिखाई दे रहा है। पार्षदों ने हंगामे के दौरान माइक,

कुर्सी और टेबल भी तोड़ दिए।

पीठासीन अधिकारी की पीड़ा कौन सुने

इतना ही नहीं पार्षदों ने निगम सचिव से फाइल तक छीन ली।

पार्षदों के हंगामें पर पीठासीन अधिकारी सत्या शर्मा ने कहा कि

उन्होंने सदन की कार्रवाई सुचारू रूप से चलाने के लिए कई बार

अपील की, लेकिन वे नहीं माने और अपना हंगामा जारी रखा। आम आदमी पार्टी के

पार्षद सत्या शर्मा की अपील के बावजूद भी अपनी सीटों पर बैठने के लिए तैयार नहीं थे।

पीठासीन अधिकारी के आसन पर भाजपा पार्षद चढ़े और दोनों पार्टियों के पार्षद

एक दूसरे पर चोर होने का आरोप भी लगाते हुए नारेबाजी कर रहे थे।

कई पार्षद तो मारपीट के बाद पीठासीन अधिकारी के आसन के नीचे गिर गए।

आप पार्षद प्रवीण राणा ने आरोप लगाया कि उन्हें जान से मारने की कोशिश की गई।

उनका गला दबाने की भरसक कोशिश भाजपा के पार्षदों ने की।

भाजपा के आदेश गुप्ता ने कहा कि अराजकता आप की मानसिकता में निहित हो चुकी है।

आम आदमी पार्टी ने सदन में गुंडागर्दी करके लोकतंत्र का खिलवाड़ किया है।

यह आप के गुंडों का काम है क्योंकि इनकी नैतिक स्तर पर हार हुई है।

आज के हंगामे के बारे में कहा जाय तो यह पूरी तरह

एलजी और आप के बीच टकराव का मामला है।

अगली बैठक पर संशय बरकरार

अगली बैठक का फैसला एलजी के हाथ में है। सोमवार को

फिर से सदन की बैठक हो सकती है पर राजनीतिक क्षेत्रों में

यह कयास लगाया जा रहा है कि मेयर चुनाव की प्रक्रिया

अप्रैल तक भी टाली जा सकती है। इस तरह आज दिल्ली में

जो कुछ हुआ वह असंवैधानिक तो था ही अशोभनीय भी था।

इसके पहले देश विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं में इस तरह

के नजारे प्रायः देखने को मिल जाया करते थे। जब सत्तारूढ

और विपक्ष के बीच किन्हीं मुद्दों को लेकर टकराव तेज हो जाता था,

तब सदन की मर्यादा तार-तार हो जाती थी।

जब एक दूसरे पर कुर्सी उछाली जाती, कॉलर पकड़ा जाता

और पीठासीन अधिकारी को कामकाज से रोक दिया जाता था।

कई बार तो देखा गया है कि सदन में पीठासीन अधिकारी की

अपील को हमारे जनप्रतिनिधि अनसुना तक कर देते हैं।

बेबस असहाय सभापति सदन की कार्रवाई स्थगित करने

के पहले सदस्यों को निलंबन तक का आदेश दे

दिया करते हैं, लेकिन इससे भी समस्या का समाधान

नहीं होता और दूसरे दिन फिर सदन में वही हंगामा,

वही उबाल देखने को मिलता है।

Chaos in the politics of Delhi MCD :लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर सुलगते सवाल

सवाल ये है कि हमारे जन प्रतिनिधि कब गंभीर होंगे,

और कब जनता के मुद्दों को लेकर उसके निराकरण के लिए ईमानदारी से प्रयास करेंगे।

आज देखा जाय तो राज्य की विधानसभा के सत्र केवल

औपचारिकता निभाने के लिए बुलाए जाते हैं।

सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाना चाहती है, विपक्ष अपनी

मांगों को लेकर सख्त रवैया अपनाता है और सरकार को पूरी

तरह कामकाज करने से रोकना ही उसका धेय बन गया है।

दो या तीन दिन में ही विधानसभा की कार्रवाई सिमट जाती है,

और फिर अगली बार मिलने का वादा करके सभापति अपना

दायित्व निभाते देखे जा सकते हैं। पर क्या यह समस्या हल है कि

अगला सत्र फलां-फलां तारीख से फिर होगा ? या हम फिर मिलेंगे ?

नहीं, इस बात की कोई गारंटी नहीं कि फिर

विधानसभा का सत्र सुचारू रूप से चले और विपक्ष सरकार के

कामकाज में सहयोग करे ताकि जनता की समस्याओं

का निराकरण किया जा सके।

किस-किस के बीच रही ये लड़ाई

आज दिल्ली की लड़ाई को उप राज्यपाल वर्सेज मुख्यमंत्री कहा जाय

तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। और ये देखा गया है कि मुख्यमंत्री और राज्यपाल के

बीच मतभेद होना और टकराव अब आमबात हो गई है। दिल्ली ही नहीं

पुडुचेरी से लेकर छत्तीसगढ़ तक में इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं।

राज्यपाल यदि केंद्र के एजेंट के रूप में कार्य करें और मुख्यमंत्री स्थानीय

मुद्दों को प्राथमिकता देते हुए आगे बढ़ें तो दोनों के बीच में मतभेद उभरने के

आसार रहते हैं। और होता यही है कि दोनों शीर्ष पदों पर बैठे लोगों

की आपस में नहीं बनती, क्योंकि दोनों ही अपनी-अपनी पार्टी की

विचारधाराओं से बंधे होते हैं। और उन्हें भविष्य में

अपनी पार्टी का बेड़ा पार करना होता है।

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