म्यांमार में तख्तापलट की पेचीदगियां : सैन्य तानाशाही सख्त नापसंद

जी. पार्थसारथी
आज की तारीख में दुनियाभर में लोगों को सैन्य तानाशाही सख्त नापसंद है। इसके बावजूद सैन्य विद्रोह होते रहते हैं, खासकर अफ्रीका में। हालांकि अब वहां भी इनकी आवृत्ति पहले से काफी कम है, क्योंकि सैनिक शासकों का बहिष्कार होने लगता है और विदेशी सहायता बंद हो जाती है। लेकिन एशिया के दो देश-पाकिस्तान और म्यांमार- ऐसे हैं, जहां राष्ट्रीय मामलों और नीति निर्धारण में सेना का बहुत ज्यादा दखल है। पाकिस्तान में सेना ने अपने पास जो शक्तियां केंद्रित कर रखी हैं, वह नितांत असंवैधानिक हैं। वहां सेना ने खुल्लम-खुल्ला मुख्य ताकत अपने हाथों में समेट रखी है, तख्तापलट के डर के मारे कोई सिविलियन सरकार सेना को चुनौती देने का साहस नहीं करती। इसके अलावा पाकिस्तानी सेना को मालूम है कि कैसे राजनेताओं को अपने इस्तेमाल के लिए इशारों पर नचाना है और जब कोई नागवार बन जाए तो रद्दी की टोकरी में कब डालना है। इस सबके बावजूद अमेरिकी सरकार ज्यादातर समय पाकिस्तानी सेना की इस असंवैधानिक भूमिका को लेकर सहज रही है।
म्यांमार ने वर्ष 1948 में ब्रितानवी हुकूमत से आजादी पाई थी। इसके बाद 1962 से 2011 तक वहां सैनिक शासन रहा था। हालांकि सेना के दबदबे वाली सरकार ने वर्ष 2015 तक राज किया था। इसके बाद वर्ष 2016 में आंग सान सू की, की पार्टी, नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी द्वारा आम चुनाव जीतने के बाद वे अपरोक्ष शासक रही थीं। हालांकि 2008 में बनाए गए म्यांमार के संविधान के मुताबिक रक्षा और आंतरिक सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभागों का कामकाज सेना के पास रहता है। संसद में 110 सीटें सेना के लिए आरक्षित हैं। एक विदेशी से शादी करने की वजह से सू की को म्यांमार का राष्ट्रपति बनने के अयोग्य करार दिया गया था। किंतु उन्होंने बतौर ‘स्टेट काउंसलर’ रहकर राजशक्ति अपने हाथ में रखने का जुगाड़ कर लिया था, जबकि राष्ट्रपति पद महज प्रतीकात्मक बनकर रह गया था। जनरल आंग सान, जिन्हें म्यांमार का संस्थापक पिता माना जाता है और देश के पहले राष्ट्रपति भी थे, उनकी बेटी सू की ने इस कमी के बावजूद बड़ी दक्षता से राजसत्ता को अपने पास रखा और जनाधार वाला समर्थन भी अर्जित कर लिया था।
अपने जन्म से ही म्यांमार जातीय गुटों के विद्रोहों से पीडि़त रहा है। आज भी लगभग 31 जातीय बागी संगठन सक्रिय हैं, जिनके नियंत्रण में देश का काफी बड़ा हिस्सा है। इनमें से कुछ को धन और हथियार चीन से मिलते हैं। लेकिन पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए अदूरदर्शी प्रतिबंधों के कारण चीन ने वहां आर्थिक और राजनीतिक रूप से मजबूत पैर जमा लिए हैं। पिछले तीन दशकों से भारत ने दक्षतापूर्ण कूटनीति की बदौलत म्यांमार के सैनिक और राजनेताओं से अच्छे संबंध बनाकर रखे हैं। भारत द्वारा दी गई आर्थिक मदद से म्यांमार की संचार सेवाओं में सुधार हुआ है और इससे वहां आईटी सुविधाओं का विकास हो पाया है। भारतीय सहायता से म्यांमार के सीमांत इलाकों में सडक़ें विकसित हुई हैं।
बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित सित्त्वे बंदरगाह को हाल ही में भारत ने विकसित किया है। यह सुविधा भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय और असम की पहुंच समुद्र तक करने में बहुमूल्य योगदान करेगी। हालांकि अन्य कई देशों, जैसे कि सिंगापुर, थाईलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया और वियतनाम की कंपनियां भी वहां अपना काम धंधा बढ़ाने में लगी हैं। भारत ने हाल ही में म्यांमार को पहली पनडुब्बी मुहैया करवाई है परंतु म्यांमार में आर्थिक निवेश और व्यापार करने वाली भारत की निजी कंपनियां लगभग न के बराबर हैं।
चीन से नजदीकी होने के बावजूद म्यांमार ने भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों के विभिन्न विद्रोही गुटों की गतिविधियों को नकेल डालने अथवा खत्म करने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जिसके बूते पर भारत अपने उत्तर-पूर्वी सूबों में आतंक मचाने वाले सशस्त्र विद्रोहियों को काफी हद तक कमजोर करने या लगभग समाप्त कर पाया है। भारत के अनेक पृथकतावादी संगठन जैसे कि नागालैंड का एनएससीएन (खपलांग) और एनएससीएन (आईएम) गुट, असम का उल्फा और मणिपुर के विद्रोही संगठनों के कारकुन आमतौर पर म्यांमार में दाखिल होते रहते हैं और स्थानीय पृथकतावादी गुटों जैसे कि काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी के साथ घनिष्ठ संबंध बना रखे हैं। इसके बाद यह लोग साथ लगते चीन के युन्नान प्रांत में जा घुसते हैं, जहां उनको पनाह मिलने के अलावा हथियारों का प्रशिक्षण और लैस करने का काम किया जाता है और भारत में सशस्त्र विद्रोह फैलाने के लिए उकसाया जाता है। भारत ने भी म्यांमार के सशस्त्र पृथकतावादी गुट जैसे कि अराकान आर्मी को अपनी भूमि पर अड्डे बनाने से रोके रखा है। इन गुटों से निपटने में भारत और म्यांमार ने नजदीकी सहयोग बनाकर काम किया है। इस बात की आशंका से म्यांमार में स्थितियां काबू से बाहर हो सकती हैं, भारत ने आम चुनाव से पहले सेनाध्यक्ष जनरल नरवाणे और विदेश सचिव हर्षवर्धन शिंगला को अक्तूबर माह में दौरे पर भेजा था। चीन के विदेश मंत्री ने भी इसकी नकल करते हुए वहां दौरा किया था।
कोई हैरानी नहीं कि आंग सान सू की, की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी ने 330 सीटों में से 258 प्राप्त कर दुबारा पूर्ण बहुमत प्राप्त कर सत्ता हासिल कर ली थी। सेना को संसद में अपने कोटे के 110 उम्मीदवारों को नामांकित करना था। म्यांमार के संविधान के अनुसार संसद का अधिवेशन 3 फरवरी को होना था, लेकिन 2 फरवरी को सेना ने तख्तापलट कर सू की एवं उनके समर्थकों को गिरफ्तार कर लिया। साथ ही, लोगों द्वारा किए जाने वाले आंदोलन को रोकने के लिए छापेमारी शुरू कर दी। पश्चिमी ताकतें, जो हाल तक आंग सान सू की, की इस बात को लेकर आलोचक रही थीं कि उन्होंने सेना द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों पर क्रूर सांप्रदायिक सैनिक कार्रवाई का समर्थन किया है और जिसकी वजह से उन्हें बांग्लादेश और भारत में शरण लेनी पड़ी थी, अब वही मुल्क सू की को रिहा करने की मांग कर रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली और जापान वाले जी-7 संगठन और यूरोपियन यूनियन देशों ने म्यांमार की सेना को कहा है कि आपातकाल को तुरंत हटाया जाए और सत्ता पुन: लोकतांत्रिक ढंग से चुनी सरकार को सौंप दे।
यह भी तय है कि म्यांमार में सैन्य शासन खत्म करने और लोकतंत्र बहाली को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा उठाए किसी भी कदम को रूस और चीन वीटो कर देंगे। इसके अलावा म्यांमार के दक्षिण एशियाई पड़ोसी देशों में आसियान संगठन के सदस्य उस पर प्रतिबंध लगाने के खिलाफ हैं। जापान और भारत म्यांमार में बनी स्थिति से निपटने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। जापान का मानना है कि म्यांमार को अलग-थलग कर देने का मतलब है सेना का चीन के पहलू में जा बैठना। भारत को इसलिए जापान के साथ सहयोग करना होगा, जैसा कि विगत में किया है, ताकि नागवार गतिरोध बनने से रोकने को बातचीत जारी रहे। पाकिस्तान और श्रीलंका की बनिस्पत म्यांमार की सरकार चीन के कर्ज-मकडज़ाल में फंसने से बचने को काफी सतर्क रही है। भारत और जापान को संयुक्त रूप से अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया को यह अहसास करवाना होगा कि म्यांमार को अलग-थलग करके वे वहां चीन की अधिक उपस्थिति का मौका दे रहे हैं, जिससे कि उसे आगे बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने में मदद मिलेगी।

 

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