पहले अपनी हस्ती तो देखिए : दंबग बनें, सम्मान पाएं

सहीराम

मुंह में राम और बगल में छुरी का दिखावा अब बिल्कुल भी नहीं चलेगा
देखिए जनाब, सोशल मीडिया पर ट्रोल करने की आजादी, गालियां देने की आजादी तो खूब है। पर यह गलतफहमी आपको क्यों हो गयी कि आपको किसानों के आंदोलन का समर्थन करने की भी आजादी है। सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी को पूरी छूट होती है कि वह किसी पर भी टूट पड़े, पर किसी को यह आजादी नहीं है कि वह न्याय के लिए लडऩे वालों के हक में खड़ा हो जाए। बच्चा होना, नादान होना, मासूम होना कोई दलील नहीं है। अब भाई विश्वविद्यालयों में बाहर से आकर लाठी-डंडे बरसाने वालों को, छात्रों के साथ गाली-गलौच करने वालों को तो बेशक पूरा संरक्षण हासिल होता है, लेकिन उसी संस्थान के छात्र अगर यह समझें कि उन्हें भी ऐसा ही संरक्षण मिल जाएगा और कि वे इसके हकदार भी हैं तो समझिए कि वे गलतफहमी के ही शिकार हैं।
जैसे सीएए विरोधियों पर बंदूक तानने वाले को तो अपनी पार्टी में शामिल करके पार्टी वाले गर्वित महसूस कर सकते हैं और गाजीपुर बार्डर पर बैठे किसानों को धमकाने के लिए लाठी-डंडों के साथ अपने दो-चार सौ लोगों को लेकर पहुंचने वाले विधायक को भी उनकी पार्टी में पूरा सम्मान दे सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आंदोलनकारियों को भी सम्मान मिलेगा। जनाब यह नया भारत है। यहां अगर आपको सम्मान चाहिए तो आपके हाथ में डंडा और मुंह में गाली होनी चाहिए। मुंह में राम और बगल में छुरी का दिखावा अब बिल्कुल भी नहीं चलेगा। दंबग बनें। सम्मान पाएं।
दिशा रवि और उनके जैसे दूसरे युवाओं को इस सच्चाई को बहुत पहले समझ लेना चाहिए था। वे पर्यावरण कार्यकर्ता हैं, अच्छी बात है। तो भैया जलवायु-जलवायु खेलती न। बड़ा अच्छा खेल है। हालांकि सेठ लोगों को यह भी बहुत ज्यादा पसंद नहीं कि लोग हमेशा जलवायु-जलवायु ही खेलते रहें। इससे धरती का सीना चीर कर खनिज निकालने में दिक्कत पेश आती है। उन्हें यह खेल इतना ही पसंद आता है कि आप शाकाहारी खाना खाएं और मोर को दाना चुगाइए। इसमें काफी जलवायु है। यह खेल तो ट्रंप साहब को ही पसंद नहीं आया था और उन्होंने ग्रेटा थनबर्ग का काफी मजाक भी बनाया था। बाद में खुद मजाक का विषय बन गए, यह अलग बात है।
बताते हैं दिशा रवि उसी ग्रेटा की अनुयायी है, इसीलिए वह किसानों के पक्ष में खड़ी हो गयी। यह ठीक है कि कृषि और फसल का मामला जलवायु से जुड़ा हुआ है, पर उसके लिए आंदोलन का समर्थन करने की क्या जरूरत थी। अब ग्रेटा तो भैया बड़ी हस्ती हैं, अपनी क्या हस्ती है। बल्कि आपकी हस्ती तब भी बन सकती थी कि अगर आप इन किसानों को गरियाते। पर इतना जिगरा तो किसी मंत्री का ही हो सकता है।

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