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Sunday, September 25, 2022

मनोरम घाटी में विराजमान बाबा भोरमदेव , जानिए क्या है मंदिर की विशेषता…

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 कर्वधा।  सावन महीना भगवान शिव के आराधना का होता है। ऐसी मान्यता है कि इस माह में भगवान भोलेनाथ अपने भक्तों की आराधना से काफी प्रसन्न रहते हैं। सावन का पावन माह चल रहा है और भगवान शिव के अलग -अलग मंदिरों के दर्शन और शिव की बात न हो तो फिर पूजा जो है वो अधुरी रहती है।

तो आइये हम आपको छत्तीसगढ़ के एक ऐसे मंदिर के बारे में बता रहे हैं जिसकी विशेषता बहुत ही आकर्षण और भव्य है , बिल्कुल खजुराहो के कोर्णाक मंदिर के समान इसकी डिजाइन की है।

जिसकी स्थापना गोंड वंशीय राजाओं ने की है और मंदिर का निर्माण नागर शैली में किया गया है।

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Bhoramdev temple located in Kawardha district of Chhattisgarh

जी हां हम बात कर रहे हैं छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में स्थित मंदिर भोरमदेव की। भोरमदेव को छत्तीसगढ़ के खजुराहो के नाम से जाना जाता है।

भोरमदेव का मंदिर कबीरधाम जिला मुख्यालय से लगभग 16 किलोमीटर दूर , धरती को स्वर्ग सामान अनुभूति देने वाले विशाल मैकल पर्वत श्रेणी की गोद में विराजमान है।

मंदिर के चारों ओर हरी भरी घाटियों का मनोरम दृश्य और सुंदर तालाब भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करने वाला है और इसी मनोरम घाटी में स्थित मंदिर के गर्भगृह में बाबा भारमदेव स्थित है।

बताया जाता है की इस मंदिर का निर्माण 1000 साल पहले 7 वीं से 11 वीं शताब्दी तक शासन करने वाले नागवंश के प्रतापी राजा गोपाल देवराय ने कराया था।

इसके बाद गोंड वंशीय राजाओं ने भोरमदेव मंदिर उपासना की शुरुवात की।

बताया यह भी जाता है की गोंड वंशीय राजाओं के प्रमुख देवता भगवान भोरमदेव थे और बाबा भोरमदेव भगवान शिव का ही नाम है।  जिसके कारण इस मंदिर का नाम भोरमदेव मंदिर पड़ा।

इस मंदिर का निर्माण नागर शैली में किया गया है। यह खजुराहो तथा कोणार्क मंदिर के समान हैं। जिसके कारण इस मंदिर को छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी कहा जाता है।

The fame of Bhoramdev temple across the country

भोरमदेव मंदिर की प्रसिद्धि देश भर में है। इस मंदिर में न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि देश भर और विदेशों से भी लोग आते हैं। ऐसा माना जाता है की जो कोई भी भक्त अपनी मनोकामना लेकर बाबा के पास पहुंचते हैं उनकी मनोकामना भगवान भोलेनाथ अवश्य पूरी करते है।

भोरमदेव मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अलावा भी कई अन्य मंदिर स्थित हैं। इनमें रुद्राक्ष महादेव का मंदिर प्रमुख है।

रुद्राक्ष महादेव के मंदिर में ऐसी महिलाएं जिन्हें संतान नहीं हो रहा है, जिन्हें मातृ सुख नहीं मिल पा रहा है वे दूर -दूर से संतान प्राप्ति की मनोकामना लेकर आती हैं।

मान्यता है कि इस मंदिर में पूजा अर्चना करने से महिलाओं को संतान की प्राप्ति होती है।

Apart from the main temple, many places are worth visiting in Bhoramdev

भोरमदेव में मुख्य मंदिर के अलावा भी कई स्थान भोरमदेव में दर्शनीय हैं ।

मंदिर से 03 किलोमीटर की दूरी पर बहुत ही सुंदर महत्वपूर्ण ऐतिहासिक मंदिर मंडवा महल स्थित है।

इसका निर्माण फणीनागवंशी राजा सम्राट रामचंद्र ने 15 वीं शताब्दी में अपनी पत्नी और हैहयवंशी राजकुमारी अंबिका देवी की याद में करवाया था।

यह मंदिर भी शिव जी को समर्पित है। यह महल 16 स्तंभों से बना है।

मंदिर के चारो ओर दीवारों पर कामुक मूर्तियां 54 मुद्राओं में दर्शाई गई है।

यह चित्र कामसूत्र से प्रेरित है। इन्हें प्रेम व सुंदरता का प्रतीक माना जाता है। मंदिर की चोटी का मध्यभाग टूटा हुआ है।

Chherki Mahal is situated in Bhoramdev temple

मड़वा महल से 1 किलोमीटर की दूरी पर छेरकी महल स्थित है। यहां भी शिवलिंग स्थापित है।

इस मंदिर का निर्माण 14 वीं शताब्दी में किया था।  इस मंदिर के आस पास जाने से बकरी की शरीर की गंध आती है।

जिसकी वजह से स्थानीय लोग इस महल को छेरकी महल कहते है।

चूंकि स्थानीय भाषा में बकरी को छेरी कहा जाता है।  इस साल भी लोग बड़ी संख्या में भोरमदेव पहुँच रहे हैं।

जिला प्रशासन की टीम ने इस वर्ष बहुत अच्छी व्यवस्था की है। मंदिर के समाने सुंदर तालाब में बोटिंग श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। सावन के महीने में मेले जैसा माहौल रहता है।

स्थानीय जिला प्रशासन और मंदिर ट्रस्ट की ओर से बाबा भोरमदेव की शिवलिंग को क्षरन से बचाने के लिए शिवलिंग के ऊपर 24 किलोग्राम चांदी की परत चढ़ाई गई है।

जिससे बार बार श्रद्धालुओं से हस्त स्पर्श से बाबा भोरमदेव की शिवलिंग का क्षरण न हो।

सावन माह में हजारों की संख्या में श्रद्धालु मंदिर में बाबा भोरमदेव की दर्शन के लिए पहुंच रहे है।

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