गुड टच और बैड टच को लेकर जनधारा मीडिया समूह की सुरुचि मिश्रा धनेरवाल ने मनोचिकित्सक डॉक्टर भूषण शुक्ला से की खास बातचीत

रायपुर| (Good Touch and Bad touch) बच्चों को सँभालने में और उनको बुरी आदतों, गलत संगत से बचाने के लिए माता-पिता को खासी मशक्कत करनी पड़ती है. बच्चों की मानसिकता समझने के लिए पालकों को भी परेशानी होती है. इन्ही सब समस्याओं को दूर करने आसान तरीका समझाया है जाने माने बाल एवं किशोर मनोचिकित्सक डॉक्टर भूषण शुक्ला ने जो अमीर खान के फेमस टीवी शो ‘सत्यमेव जयते’ में भी हिस्सा ले चुके हैं. हालांकि जब सत्यमेव जयते की टीम ने डा. शुक्ला को काल किया था तो वे इसे फेक काल समझे और कहा कि अगर आप आमिर खान के यहां से बोल रहे है तो मै भी राष्ट्रपति भवन से बोल रहा हूँ.  इसके बाद टीम ने उनको आधिकारिक ई मेल भेजा तब वे उस शो में शामिल हुए और बाल एवं किशोर मनोवृत्ति के साथ-साथ बालिकाओं के साथ होने वाली  समस्याओं को भी विस्तार से समझाया और उससे बचने के भी उपाय बताये थे. राजधानी रायपुर पहुंचे डॉक्टर भूषण शुक्ला जनधारा मीडिया हॉउस पहुंचे और बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा से जुड़े अपने अनुभव को साझा किया. प्रस्तुत है उनसे चर्चा के कुछ अंश-

23 साल पहले आपने अपनी जर्नी की शुरुआत की थी उसके बारे में हमें बताएं?

 (Good Touch and Bad touch) उत्तर- जब मैं एमडी कर रहा था 1996 से 1999 तक तब पेशेंट्स को एग्जामिन कर रहे थे उस समय मैं  गवर्नमेंट हॉस्पिटल में था बहुत सारे लोग आते थे. तो कई बार मरीजो की हालत देख कर लगता था कि  इस आदमी को अगर बचपन में मदद मिल जाती तो शायद आज इसकी हालत ऐसी न होती. तो इसी घटना ने मुझे प्रेरित किया कि मैं बच्चों के लिए काम करूँ. जिसके बाद मैंने ट्रेनिंग ली.

पेरेंटिंग के इस नए दौर में आप क्या कहना चाहेंगे खासकर कोविड-19 के दौरान जब कई माता-पिता को मुश्किलों का सामना करना पड़ा?

उतर- पैरेंट्स  के लिए यह बहुत बड़ी दिक्कत रहती है क्योंकि सिर्फ बच्चों के साथ ही उन्होंने ज्यादा टाइम स्पेंड किया बल्कि एक दूसरे के साथ भी ज्यादा टाइम उस स्पेंड किया. काफी सारी फैमिली में इतना सारा वक्त एक साथ शायद जिंदगी में कभी नहीं बिताया हो. तो ऐसा हो जाता है कि आप जब किसी के साथ बहुत ज्यादा टाइम रहतें है या रहना पड़ता है तो फिर एक्शन हो जाता है तो काफी सारी फैमिलियों के परीक्षण को देखा गया है इसमें कई बार रिलेशनशिप्स चेंज हो जाते हैं और कई लोगों ने इसका अच्छी तरह से उपयोग करके अपने रिश्तो की गहराइयां बढाई है.

बच्चे स्कूल नहीं जा रहे बच्चे खेलने नहीं जा रहे थे घरों में बंद थे स्कूल खुल गए हैं बहुत सारे ऐसे छोटे बच्चे थे जिन्होंने नर्सरी,  केजी वन और के जी टू का सफर नहीं किया, और अब बड़ी कक्षाओं में उन्हें बैठना पड रहा है.  महामारी के दौरान उनको बहु नुकसान हुआ. इस वजह से वो अलग तरह का टेंशन महसूस करते हैं अपने आसपास और वही क्लास टीचर्स भी इसे समझ रहे है. हम किस तरह से मदद प्रदान कर सकते हैं?

उत्तर-  2 से ढाई साल तक बच्चे स्कूल नहीं गए हैं और उन्हें काफी फ्रीडम रहा स्कूलों में ऑनलाइन प्रक्रिया के चलते उन्होंने कभी भी वह टेंशन महसूस नहीं किया जो अक्सर रोजमर्रा की जिंदगी में स्कूल जाते हुए बच्चे को होती है. कोरना महामारी के चलते सब कुछ ऑनलाइन चल रहा था जिसकी वजह से उन्हें इतनी फ्रीडम मिल रही थी. आपको कोरोना महामारी जहां खत्म होती दिखाई दे रही है वही बच्चों को भी रियालिटी फेस करना पड़ रहा है रोज सुबह स्कूल जाना और अपने आसपास की बदलती चीजों को अपनाना पड़ रहा है इससे बच्चों को कई तकलीफों का सामना करना पड़ रहा है. हर क्लास में दो से तीन बच्चे ऐसे हैं जो अब स्कूल के नाम से डर जाते हैं और उनके अंदर इस बात को लेकर डर  आ गया है. मुझे लगता है कि हम भारत में हमेशा से कम्युनिटी विचार की बात करते हैं. तो एक-एक बच्चे का अलग-अलग काउंसिल करना बहुत ज्यादा अच्छा रहेगा और साथी बच्चे अगर एक दूसरे की मदद करते हैं और उन्हें समझाएं तो यह समस्या बिना किसी मेडिकेशन के खत्म हो सकती है. इसके लिए  सिर्फ कम्युनिटी एक्शन की जरूरत है. (Good Touch and Bad touch)

कई बार ऐसा देखा गया है कि स्कूल में काउंसलिंग है वह होती ही नहीं है. और टीचर कहते हैं कि बच्चे का परफॉर्मेंस कमजोर है उस समय किस तरीके से काम करना चाहिए?

उत्तर- मुझे लगता है कि बच्चों पर अभी के प्रॉब्लम का स्टेटमेंट बताना या लेवल लगाना गलत है. इसकी हम जब भी बच्चों के बारे में बात करते हैं तो बच्चे की डिफिकल्टीज क्या है या इस पॉइंट तक बच्चे कैसे पहुंचे हैं इसको  जानना ज्यादा जरुरी है. पेरेंट्स को और टीचर्स को बच्चे के सामने उसकी कमजोरियों की बात नहीं करनी चाहिए. काफी बार ऐसा होता है कि पीटीएम में टीचर्स और पैरंट्स बैठे हैं और बच्चा भी बैठा है लेकिन उसके मन ऐसा भाव होता है जैसे वह कटघरे में खड़ा है. और वह गुनाहगार है. यह गुनाह इसने किए हैं तो अब इसे क्या सजा दी जाए? तो इसके बदले  बच्चों को क्या  डिफिकल्टी है और परफॉर्म क्यों नहीं कर रहा है? इस पर अगर चर्चा हो तो ज्यादा फायदेमंद होगा.

जो नए तरह के पेरेंटिंग है और नए तरीके के स्कूल है उसमें बोला जाता है कि मॉर्निंग रूटीन थमा दिया जाता है क्योंकि पेरेंट्स वर्किंग है तो इससे डे बोर्डिंग शुरू हो जाता फिर 24 घंटे बच्चा  मेड के साथ घर पर होते हैं कई बार बड़े स्कूल है कई आधुनिक स्कूल हैं उनमें बच्चों को गुड टच बैड टच समझाया जाता है पर कई ऐसे स्कूल है जो सामान्य श्रेणी के होते हैं वहां यह नहीं बताया जाता तो उनके लिए क्या किया आना चाहिए ?

उत्तर-  बच्चों को बेड टच का एक्सपीरियंस करना यह आजकल बहुत ही आम बात हो गई है.  सरकारी आंकड़े बताते हैं 50 से ज्यादा प्रतिशत बच्चों ने अपनी जिंदगी में बैठ टच को एक्सपीरियंस किया है इसके प्रीवेंटेटिव मेजर है कि अगर बच्चों को किसी एक व्यक्ति के साथ घर में रखा जाए तो यह ज्यादा सेव बात नहीं है. आजकल फैशन बन गया है कि  वहीं कई लोग नैनी को हायर करते हैं और अपने बच्चों की देखभाल के लिए जिम्मेदारी सौंप देते हैं तो यह बात मेरे हिसाब से बिल्कुल भी सेफ नहीं है इस से अच्छा है कि बच्चे चाइल्ड केयर में रहे  क्योंकि वहां 8-10 और बच्चे भी रहते हैं क्योंकि दूसरे के साथ ज्यादा सेफ रहते हैं. साथ ही बच्चों को बड़ा एडवांटेज यह है कि इससे बच्चे सोशलाइज होते हैं अकेले घर पर रहने वाला बच्चा राजपूत्र रह जाता है. वे अपने केयर टेकर पर आर्डर ज़माने लगते है जिससे उनकी मानसिकता में भी बदलाव आ जाता है.  इसलिए बच्चों को सेफ रखने के लिए और बच्चों को सोशलाइज रखने के लिए उन्हें ग्रुप में रखना ज्यादा उचित है इन सब में बच्चे बहुत कुछ सीख पाते हैं .

जब भी गुड टच बैड टच का मामला सामने आता है तो इसमें खुलासा किया जाता है कि यह आखिर में कोई करीबी है जो इन सब में इंवॉल्व रहता है तो पेरेंट्स बच्चों को  किस तरह से बता सकते हैं कि यह आपकी  लिमिटेशंस हैं?

उत्तर-  यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है,जैसे कि हम बच्चों को बताते है कि रास्ता कैसे क्रास किया जाए, आग  के साथ खुद को कैसे बचाएं वैसे ही यह भी सेफ्टी ट्रेनिंग है. पहली बात तो यह है कि गुड टच बैड टच जो बोला जा रहा है वह गलत है. सिर्फ बैड टच की बात होनी चाहिए. जो लोग  बच्चो के साथ  अत्याचार करते है वे गुड टच के साथ ही अत्याचार की शुरुआत करते हैं. इसलिए बच्चे गुड टच बैड टच में कन्फ्यूज हो जाते है. इम्पोर्टेंट बात यह है की बच्चो की यही बताये  कि शरीर के कुछ ऐसे हिस्से है जिन्हें आपके माता-पिता के आलावा और कोई छु नहीं सकता. अगर कोई इन जगहों पर हाथ लगाता है तो आप जोर से ना बोले तो वह इंसान डर जाता है. और भागकर अपने किसी ऐसे व्यक्ति को बत्यें जो आपको सेफ लगते हैं.  इसे हम नो, गो, टेल कहते हैं.

छत्तीसगढ़ में सुसाइडल अटेम्प्ट  देखने को मिल रहे हैं हर महीने 8-10 केस राज्य में आ जाते हैं और लगभग सभी यंग बच्चे हैं, इन सब सिचुएशन से हम बच्चों को कैसे सेव कर सकते हैं?

 उत्तर-  जो अपने सुसाइड की बात की है वो भारत के लिए बहुत बड़ी बात है. शायद यह बात काफी लोगों को पता नहीं है कि भारत सुसाइडल कैपिटल बनाता जा रहा है भारत का नंबर इस मामले में दुनिया में टॉप 10 में हम पांचवे नंबर पर है. हमारे 15 से 29 साल के युवाओं में सुसाइड जो है मृत्यु का प्रमख कारण बन गया है. यंग जनरेशन सुसाइड से मर रही है यहां 2 लाख  से ज्यादा लोग हर साल सुसाइड करते हैं। यह मानसिक अस्वस्थता का लक्षण है. यह भी अचानक नहीं होता. काफी समय से बच्चे इसको महसूस करते हैं मानसिक दबाव और फिर जब झेल नहीं पाते तो सुसाइड कर लेते हैं. मुझे लगता है कि एक सोसायटी के रूप में हमें ज्यादा ध्यान रखना होता है. आदमी जब समाज से अलग होने लगता है, समाज से अलग होने लगता है तो, अपने दायरे में ही सिमट कर रह गए है तो हम उहे चाय पर बुला कर उनसे बात कर सकते है, उनसे उनकी तकलीफ पुछ सकते. इससे हम उन्हें सुसाइड से बचा सकते हैं.

बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो ऑफिस जाते थे लेकिन अब जॉब चली गई है उनमें भी मेंटल हेल्थ की समस्या आती है रात में स्लीपिंग पिल्स लेते हैं कई सारी दवाइयां लेते हैं… अपने आप लोगों से कट जाते हैं लेकिन वह लोग फिर भी मेडिकल हेल्प नहीं लेते हैं ऐसे केस में हम किस तरह से मदद कर सकते हैं?

उत्तर-  काफी लोगो का यह विश्वास है जब आप मनोवैज्ञानिक के पास जाओगे तो आपको दवाई दी जाएगी. यह बात सही नहीं है. अधिकांश लोगो को केवल काउंसिलिंग से ही मेंटल स्ट्रेस से छुटकारा मिल जाएगा. कोई आपको टेबलेट नहीं खिलने वाला है. लोगो के मन में सबसे बड़ा डर यही है कि टेबलेट खिला दिया जाएगा, हम इसके आदी हो जाएंगे. ये सब  50-60 साल पहले की दवाइयों में होता था. अब समय बदल गया है. आधुनिक उपाय से बिना साईड इफेक्ट के हम यह कर सकते हैं.

कोविड-19 के बाद से हर कोई एंजाइटी फेस कर रहा है इसके लिए आप क्या उपाय बताना चाहेंगे जिससे इंजाइटी से बाहर आया जा सके?

उत्तर- जो सब क्लिनिकल लेवल कि एंजाइटी है मतलब आपकी एंजाइटी बीमारी नहीं बनी है vo केवल आपका डर है, तो आप स्ट्रेस को दूर करने के लिए व्यायाम कीजिये, दोस्तों के साथ वयं करें डीप ब्रेथिंग कीजिये, अपने पसंद की चीजो को भी करते रहनी चाहिए इससे आपको भी अच्छा लगेगा. सबसे ज्यादा आप नींद लेनी है, अगर नींद अच्छी होगी तो आपका मन शांत होगा. (Good Touch and Bad touch)

सत्यमेव जयते में आमिर खान ने आपके कॉन्सेप्ट बैड टच लिया था इसके बारे में आप कुछ बताइए?

उत्तर-  बैड टच और नो बैड टच पर मैं बहुत पहले से ही काम कर रहा था, तो मेरे एक दोस्त ने कहा कि भाई तू अकेले कब तक ऐसे लोगों को समझाते रहेगा? इसका एक वीडियो बनाकर यूट्यूब में क्यों नहीं डाल देते ? तो मैंने दोस्तों की मदद मिता काबरा ने काफी इंटरेस ले कर सारी  चीजे अरेंज की और वीडियो बना कर यूट्यूब में डाला और कुछ हफ्तों में है उसके दो लाख तक चले गए और एक दिन मुझे अचानक एक फोन आया और उन्होंने कहा कि वह आमिर खान प्रोडक्शन से बोल रहे हैं तो मुझे लगा कोई प्रेंक काल कर रहा है तो मैंने बोला आप आमिर खान के यहाँ से बोल रहे है तो मै राष्ट्रपति भवन से बोल रहा हूँ. तो उन्होंने बोला नहीं सर हम सीरियस है. तो मैंने बोला अगर ऐसा है तो मरे इमेल पर आप अपना ऑफिसियल मेल कीजिये. और 5 मिनट के भीतर ही मेल आ गया. फिर हम बच्चों को लेकर स्टूडियो पहुंचे वहां आमिर खान से मुलाकात की और इस एपिसोड की शूटिंग हुई.

सत्यमेव जयते में एपिसोड पर चलने से क्या फायदा हुआ? (Good Touch and Bad touch)

उत्तर- आमिर खान जैसा अगर कोई जाना माना चेहरा इस तरह के बड़े मुद्दों को बड़े टेलीविजन पर उठाता है तो इसका समाज में बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है जब शुरुआत में मैं स्कूलों में जाता था तो टीचर्स मुझे धक्के देकर बाहर निकाल देते थे. प्रिंसिपल बोलते थे डाक्टर शुक्ला ये आप क्या बोल रहे हैं. हमारी संस्कृति में एसा नहीं होता है. हमारे बच्चे सब खुशहाल है. जब नेशनल टेलीविजन में यह बात छेड़ी तो लोगो की आँख खुली. सत्यमेव जयते पर इस एपिसोड के चलने से समाज में काफी जागरूकता आई है. 2 साल बाद पॉस्को एक्ट भी आया.

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