Bastar Dussehra Exclusive: जाने क्या है काछिनगादी की प्राचीन रस्म, क्यों नुकीले कांटों पर बैठती है देवी

(Bastar Dussehra Exclusive) बस्तर की आराध्य लोकदेवी माई दंतेश्वरी के प्रति असीम आस्था व प्राचीन परंपरा का पर्याय है बस्तर दशहरा का पर्व है। काकतीय नरेश पुरुषोत्तम देव के द्वारा शुरू किया गया यह पर्व लोकआस्था के संगम का प्रतीक है। यहां के लोग ये रस्म बड़ी ही धूम-धाम से निभाते हैं।

क्या है काछिनगादी…

यह रस्म बस्तर दशहरा के निरंतर चलने वाले रस्मों में प्रथम रस्म है। काछिनगादी का अर्थ है काछिन देवी को गद्दी देना। पूर्ण अर्थ में काछिन देवी को ऐसी गद्दी देना जो नुकीले कांटों से बनाई गई हो। यह काछिन देवी रण देवी भी कहलाती है। कांटो में बैठी यह देवी कांटों भरे जीवन से जीतने का संदेश देती है।

पनिका समुदाय की इष्ट देवी काछिन माता

पनिका समुदाय की इष्ट देवी काछिन माता से आशीर्वाद लेने के लिए यह रस्म निभाई जाती है। इस गुड़ी में लगभग 9 वर्ष की मिरगान कुँवारी कन्या के ऊपर देवता आने की बातें आंचलिक तौर पर मानी जाती है। इस हृदयस्पर्शी कार्य के लिए प्रति वर्ष एक नई कन्या का चयन किया जाता है, जो पनिका समुदाय की होती है। मान्यता के अनुसार काछिन देवी धन-धान्य की वृद्धि और रक्षा करती हैं। देवी के आगमन पर कन्या को कांटों से बने झूले पर सुलाया जाता है और पूजा अर्चना कर कई रस्मों को पूरा किया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि, माता अपने गले से माला उतारकर पुजारी को दे देती है, तो यह दशहरा समारोह का स्वीकृति सूचक प्रसाद मिलना समझा जाता है और यह पर्व धूमधाम से प्रारंभ हो जाता है।

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