Jandhara Special – विश्व प्रसिद्ध ‘बस्तर दशहरा’ व लोक रस्मों की कड़ी, जानें क्या हैं लोकमान्यताएं और लोकमहत्व…

पूनम ऋतु सेन- बस्तर। ‘बस्तर दशहरा’ और इससे संबंधित सारे रस्मों को विस्तार से जानने के लिए हम अपने पाठकों के समक्ष बस्तर दशहरा की एक सीरीज लेकर आये हैं। इस कड़ी में हम एक-एक दिन क्रमवार रस्मों और मान्यताओं  को  विस्तार से जानेंगे।

आज की इस कड़ी में आइये जानते हैं कि क्या है बस्तर दशहरा की मान्यताएं, लोककथाएं, पर्व का प्रारंभ और लोकमहत्व-

बस्तर अंचल में मनाए जाने वाले पारंपरिक त्योहारों में दशहरा सबसे बड़ा त्योहार है। यह पर्व दुनिया भर में अपनी अनूठी पहचान रखता है। 75 दिनों तक चलने वाले इस त्योहार को देखने के लिए विश्व के कई अलग अलग हिस्सों से लोग यहां आया करते हैं।

अन्य दशहरा उत्सव से अलग है इसकी मान्यतायें

बस्तर का दशहरा भी मैसूर के दशहरे जैसा ही प्रसिद्ध है। हालांकि इस बस्तर दशहरे का संबंध रावण के अंत और राम की अयोध्या वापसी से नहीं है। यह मां दुर्गा द्वारा महिषासुर वध को लेकर उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
‘श्रावण अमावस्या से लेकर आश्विन शुक्ल त्रयोदशी’ तक चलने वाले 75 दिनों का यह पर्व मां दंतेश्वरी को समर्पित है। 13 दिनों तक विभिन्न रस्मों के साथ यह पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

आदिवासियों ने दिलाई बस्तर दशहरा को प्रसिद्धि

614 साल पुराने इस पर्व का ऐतिहासिक और पारंपरिक महत्व है, जो पारंपरिक रस्मों के लिए बस्तर की प्रतिनिधि परंपरा का सूचक है। बस्तर के आदिवासियों की अभूतपूर्व भागीदारी का प्रतिफल है कि बस्तर दशहरा की अपनी राष्ट्रीय पहचान स्थापित हुई है।

कब हुई बस्तर दशहरे की शुरुआत?

बस्तर दशहरा पर्व की शुरुआत सन् 1408 ई. में चालुक्य वंश के चौथे राजा पुरूषोत्तम देव ने की थी। अंचल की सुख समृद्धि की कामना के साथ राजा पुरूषोत्तमदेव ने जगन्नाथपुरी की यात्रा प्रजा के साथ की। इस ऐतिहासिक पैदल यात्रा में वे मुरिया, भतरा, गोंड, धाकड़, माहरा तथा अन्य जातियों के मुखिया सहित रवाना हुए। स्वयं राजा ने भी सवारी का प्रयोग नहीं किया।

जनश्रुतियों के अनुसार जब राजा पुरूषोत्तमदेव अपनी प्रजा व सैन्यदल के साथ जगन्नाथपुरी पहुंचे, तब पुरी नरेश द्वारा उनका भव्य स्वागत किया गया। दंतकथाओं में यह बताया गया है कि पुरी नरेश के स्वप्न में स्वयं भगवान जगन्नाथ आये और उन्हें बस्तर नरेश के आगमन पर ससम्मान स्वागत करने का आदेश दिया। तब पुरी नरेश ने भक्ति व मित्रता भाव के साथ उनका भव्य स्वागत किया। बस्तर के राजा पुरुषोत्तम देव ने एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ, बहुमूल्य रत्न आभूषण और बेशकीमती हीरे-जवाहरात पुरी के मंदिरों में जगन्नाथ स्वामी के श्रीचरणों में अर्पित किया।

बस्तर नरेश की भक्ति भावना से प्रसन्न होकर पुरी के राजा ने सोलह चक्कों का रथ राजा को प्रदान करने का आदेश प्रमुख पुजारी को दिया। इसी रथ पर चढ़कर बस्तर नरेश और उनके वंशज दशहरा पर्व मनाते हैं। ‘लहुरी रथपति’ की उपाधि भी राजा पुरूषोत्तमदेव को इसी प्रसंग के बाद मिली।

इस सीरीज की अगली कड़ी में हम ‘पाटजात्रा’ रस्म के विषय में जानेंगे।  ऐसे ही अन्य रोचक तथ्यों को जानने के लिए जनधारा मीडिया से जुड़े रहें।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *