साहित्य जगत को अपनी रचना ‘अंधेरे में’ से चमत्कृत करने वाले मुक्तिबोध की याद में…

रायपुर। गजानन माधव मुक्तिबोध की आज जयंती है, इतने सालों बाद भी मुक्तिबोध की रचनाएं फिर वो कविताएं हों या फिर कहानियां प्रासंगित बनी हुई हैं। उनकी जंयती के मौके पर हम आज के दौर के साहित्यकारों के माध्यम से मुक्तिबोध को याद करते हैं साथ ही कुछ और समझने की कोशिश करते हैं।

भोलाशंकर तिवारी की फ़ेसबुक वॉल से साभार-

जीवन संघर्ष को अपनी कविताओं से ऊर्जा देने वाले कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की आज जयंती है । 13 नवम्बर 1917 को जन्मे मुक्तिबोध के बारे में पुरे विश्वास से कह सकते हैं कि उनके जैसा कोई दूसरा कवि नहीं है । आंतरिक द्वंद्व और बाहरी संघर्ष के तानों बानो से बुनी उनकी कविता हमें यथार्थ के ऐसे धरातल पर ले जाती है जो हिंदी कविता में अन्यत्र नहीं दिखती और रोचक यह कि इस यथार्थ में गजब की फैंटेसी है । मुक्तिबोध की कविताएँ पहली दृष्टि में दुरूह लग सकती है लेकिन एक बार उसे जानने समझने के बाद पाठक उन कविताओं के मोहपाश में बंध जाता है ।

मुक्तिबोध ने चांद का मुंह टेढ़ा है, भूरी भूरी ख़ाक धूल, काठ का सपना, विपात्र, नयी कविता का आत्मसंघर्ष, नये साहित्य का सौंदर्य शास्त्र आदि कृतियों का सृजन किया । मुक्तिबोध की कविताओं के बारे में कवि शमशेर बहादुर सिंह की यह टिप्पणी बहुत मानीखेज़ है – मुक्तिबोध की कविताएँ देश के आधुनिक जन इतिहास का दहकता इस्पाती दस्तावेज है ।

पता नहीं…
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मुख है कि मात्र आंखे हैं वे आलोक भरी
जो सतत तुम्हारी थाह लिए होतीं गहरी
इतनी गहरी
कि तुम्हारी थाहों में अजीब हलचल
मानो अनजाने रत्नों की
अनपहचानी सी चोरी में
धर लिए गए
निज में बसने , कस लिए गए ।
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अंधेरे में ( कुछ अंश )

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ज़िन्दगी के
कमरों में अंधेरे
लगाता है चक्कर
कोई एक लगातार
आवाज़ पैरों की देती है सुनाई
बार बार …. बार बार
वह नहीं दिखता
नही ही दिखता
किन्तु वह रहा है घूम
तिलस्मी खोह में गिरफ़्तार कोई एक
भीत पार आती हुई पास से
गहन रहस्यमयी अंधकार ध्वनियां
अस्तित्व जनाता

कुहरीला कोई बड़ा चेहरा फैल जाता है
और मुस्काता है
पहचान बताता है
किन्तु मैं हतप्रभ
नहीं वह समझ में आता ।
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रमेश याज्ञिक’ की कलम से –

मुक्तिबोध को जानने के लिए उनकी रचनाओं में एक साथ कई भावों से गुजरने के पीछे के कौशल को देखने के लिए बस उनकी कविताओं, लेखों, कहानियों आदि को पढ़ लेना ही नहीं पर्याप्त है।

– वे अक्सर चर्चाओं के दौरान कहा करते थे कि लेख लिखना कठिन काम है. इसलिए लोग इससे कतराते हैं। अच्छा लेख अपने आप में एक आर्गनाइज्ड वर्क है।

– मुक्तिबोध कहते थे कि जब कभी गंभीर विषय पढ़ते- पढ़ते और रचना प्रकिया के दौरान एक मानसिक तनाव उत्पन्न होता है, अच्छे तर्कपूर्ण जासूसी उपन्यासों में जो सस्पेंस बनाया जाता है और क्लाइमेक्स में जब गुत्थी सुलझाने पर सस्पेंस विघटित होता है तब मेंटल टेंशन रिलीज हो जाता है।

– अपने एक संवाद में वे कहते हैं कि एक अच्छे पत्रकार और निबंध लेखक के लिए अधिकाधिक विषयों की जानकारी जरूरी हैं. किसी पूर्वाग्रह के बगैर राजनीतिक, आर्थिक, विज्ञान, साहित्य यहाँ तक कि पुस्तक समीक्षा भी पढ़नी चाहिए.

– एक बातचीत की प्रक्रिया में मुक्तिबोध कहते हैं आप एक बार लिखें और परफेक्ट हो जाएं ये स्थिति तो बहुत कम लोगों को हासिल होती है और उसे हासिल करने के लिए भी बहुत परिश्रम करना पड़ता है. कहते हैं वाक्य छोटे- छोटे प्रयोग करने चाहिए इससे संप्रेषणीयया बनी रहती है. बर्टेंड रसेल को पढ़ना इसलिए दुरूह लगता है कि कहीं – कहीं तो उनका एक वाक्य ही एक पैराग्राफ होता है तर्क की जटिलता के साथ ऐसी वाक्य रचना विषयवस्तु को बोझिल बना देती है.

वे कहते अनावश्यक क्लिष्ट शब्दों का उपयोग वहीं करते हैं जिनके पास तर्क नहीं होते. लफ्फाजी थोथे पांडित्य का प्रदर्शन करती है और कहते हैं कि आदरणीय के आगे परम श्रद्धेय जोड़ने से ज्यादा सम्मान जाहिर होता है, ऐसी बात नहीं. केवल बात दोहराने का सुख मिलता है. माननीय कहिए या सम्माननीय एक ही बात है.

स्रोत- ‘मुक्तिबोध की याद – रमेश याज्ञिक’

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सुभाष मिश्र की कलम से –

कालजयी रचनाकार और अपने प्रिय कवि गजानन माधव मुक्तिबोध जो हम जैसे ना जाने कितने लोगों को जैसी है दुनिया उससे बेहतर चाहिए के लिए प्रेरित करते है , को उनकी जंयती पर स्मरण करते हुए
मुक्तिबोध के शब्दों में कहा जाए तो …
तुम्हारे पास, हमारे पास,
सिर्फ एक चीज है-
ईमान का डण्डा है,
बुद्धि का बल्लम है,
अभय की गेंती हैं,
हृदय की तगारी है- तसला है
नये-नये बनाने के लिए भवन
आत्मा के,
मनुष्य के,
हृदय की तगारी में धोते हैं हमीं लोग
जीवन की गीली और
महकती हुई मिट्टी को।
जनधारा मीडिया समूह के प्रधान संपादक सुभाष मिश्रा की कलम से
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कवि रंगकर्मि हरिओम राजौरिया –

हिंदी के कालजयी लेखक गजानन माधव मुक्तिबोध का आज जन्मदिन है । 13 नवम्बर , 1917 को मध्यप्रदेश के श्योपुर कस्बे में उनका जन्म हुआ था । उनके पिता माधवराव ग्वालियर स्टेट में कोतवाल थे और उनके तबादले होते रहते थे । मुक्तिबोध की मां पार्वती अशोकनगर जिले की ईसागढ़ कस्बे के किसान परिवार से थीं ।

मुक्तिबोध ने उज्जैन से मिडल की परीक्षा दी थी और वे फेल हो गए थे , इस असफलता का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा । उनका बचपन तो अच्छा गुजरा पर आगामी जीवन में उन्हें कठोर संघर्ष करना पड़ा । उनके जीवित रहते उनकी एकमात्र प्रकाशित पुस्तक पर मध्यप्रदेश सरकार ने प्रतिबन्ध लगा दिया था । उनका लिखा ज़्यादातर मरने के बाद ही सामने आ सका। अज्ञेयजी के तारसप्तक के वे पहले कवि थे । कविता की रचनाप्रक्रिया को लेकर धारावाहिक रूप से परसाई जी द्वारा संपादित वसुधा में लिखे लेखों का संग्रह ” एक साहित्यिक की डायरी ” कविता आलोचना की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तकों में से एक है । कविता , कहानी , आलोचना पर लिखा उनका सबकुछ मुक्तिबोध रचनावली के छः खण्डों में संकलित है । लम्बी बीमारी के बाद मात्र 47 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ । हिंदी के गौरव को बढ़ाने और कविता का एक नया रास्ता तैयार करने वाले महान लेखक मुक्तिबोध को सलाम ।

कवि रंगकर्मि हरिओम राजौरिया की वाल से –
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तारण प्रकाश सिंहा, आईएएस की फ़ेसबुक वॉल से

स्व. गजानन माधव मुक्तिबोध जी प्रगतिशील काव्यधारा के सबसे सशक्त हस्ताक्षर हैं। राजनांदगांव के लिए यह गर्व की बात है कि इस शहर को उन्होंने अपनी कर्मभूमि के रूप में चुना। उनके साहित्य में जहां-तहां राजनांदगांव की इमारतें, सड़कें, गलियां, कारखाने और लोग मौजूद हैं। मुक्तिबोध के साहित्य को सहेजे रखना जितना जरूरी काम है, उतना ही जरूरी काम मुक्तिबोध के शहर में मुक्तिबोध की यादों को सहेजे रखना भी है। राजनांदगांव में समय के साथ-साथ क्षरित हो रहे मुक्तिबोध स्मारक त्रिवेणी संग्रहालय को फिर से जीवंत करते हुए उसे नया रंग-रूप में प्रस्तुत करना, इसी जिम्मेदारी को पूरा करना है। आज राजनांदगांव का गौरव ‘त्रिवेणी परिसर’ के रूप में फिर दमक रहा है।

 

आशीष त्रिपाठी की वॉल से-

आज हमारे अत्यंत आत्मीय और मार्गदर्शक पुरखे मुक्तिबोध का जन्मदिन है। यह तस्वीर रमेश मुक्तिबोध जी के घर में आज सुबह देखी। यह संभवतः ( अलीक ) पद्मसी की पेंटिंग की अनुकृति है ! बरसों से समझता-जानता रहा हूँ कि मैं कबीर, प्रेमचंद, मुक्तिबोध का विचार वंशज हूँ। यह भी समझता हूं कि बोध यह बना रहेगा तो जीवन निस्सार न होगा।

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