Health department on Ventilator: नवजात की लाश सीने से लगाए सुबह से शाम तक बैठी मौसी, पूछ रही है साहब आखिर ये व्यवस्था कैसी

Health department on Ventilator: नवजात की लाश सीने से लगाए सुबह से शाम तक बैठी मौसी, पूछ रही है साहब आखिर ये व्यवस्था कैसी

Health department on Ventilator: नवजात की लाश सीने से लगाए सुबह से शाम तक बैठी मौसी, पूछ रही है साहब आखिर ये व्यवस्था कैसी

 

जनधारा न्यूज डेस्क । Health department on Ventilator:

यहां का स्वास्थ्य विभाग वेंटिलेटर पर है और एंबुलेंस सीधे काॅमा में।

तभी तो गरीब असहाय लोगों की ये दुर्दशा हो रही है ?

आपके सामने फोटो में ये उस मासूम की मौसी अमली बाई है,

जो अपनी स्वर्गीय बहन के मृत बेटे की लाश को सीने से लगाए

सुबह से लेकर शाम तक अस्पताल के बाहर बैठी

एंबुलेंस का इंतजार करती रही।

आखिरकार फिर एंबुलेंस ने धोखा दे दिया।

उधर अस्पताल के कर्मचारियों ने कहा कि

उनका काम जिंदा मरीज को अस्पताल ले आना और ले जाना है।

लाश की जिम्मेदारी उनकी नहीं है।

बिल्कुल सही फरमा रहे हैं साहब…

यह जवाब गरीबों के लिए बिल्कुल सटीक है।

अब जरा ये भी बता दीजिए कि अगर यही महिला कोई

रसूखदार विधायक या मंत्री होती तो क्या

आपका जवाब यही होता ?

क्या उस विधायक के साथ भी ऐसा ही बर्ताव यहां किया जाता ?

Health department on Ventilator: अब जरा इस मामले को समझ लीजिए

 

Health department on Ventilator: नवजात की लाश सीने से लगाए सुबह से शाम तक बैठी मौसी, पूछ रही है साहब आखिर ये व्यवस्था कैसी
Health department on Ventilator: नवजात की लाश सीने से लगाए सुबह से शाम तक बैठी मौसी, पूछ रही है साहब आखिर ये व्यवस्था कैसी

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में एक बच्चे को जन्म देकर मां इस दुनिया से चली गई।

मां के मर जाने के बाद नवजात अपने परिजनों की छत्रछाया में सांस ले रहा था,

लेकिन यह सिलसिला ज्यादा दिन नहीं चल सका।

कुछ देर दूध पीना बंद करने के बाद वह भी

इस दुनिया को अलविदा कह गया।

बच्चे की मौत के बाद परिजन शव को गांव ले जाने

के लिए काफी परेशान थे।

मीडिया के हस्तक्षेप के बाद मेडिकल कॉलेज प्रबंधन

ने उन्हें फटकार लगाई,

तब जाकर उन्हें कुछ राहत मिली.

पूरा मामला धरमजयगढ़ के गुरमा गांव का बताया जा रहा है।

 

पहले मां की मौत, फिर नवजात की भी गई जान

दरअसल धरमजयगढ़ की रहने वाली अमली बाई इस बच्चे की मौसी है।

इस बच्चे की मां का नाम कलावती था,

जो अब इस दुनिया में नहीं है।

यह महिला अस्पताल के बाहर

सुबह 9 बजे से शाम तक बच्चे के शव को पकड़ कर

एंबुलेंस की गाड़ी का इंतजार करती रही।

30 अक्टूबर को इस बच्चे की मां कलावती का निधन हो गया था।

जिसने कुछ घंटे पहले ही बच्चे को जन्म दिया था।

गुरमा गांव में हुई इस घटना के बाद परिजन नवजात को पालने के लिए अपने पास रख रहे थे,

लेकिन कुछ समय बाद ही बच्चे ने दूध पीना छोड़ दिया

असली परेशानी तो बच्चे की मौत के बाद हुई।

कई बार एंबुलेंस बुलाने पर भी कोई जवाब नहीं मिला।

गरीबों के साथ स्वास्थ्य विभाग की ओर से

इस तरह का रूखा व्यवहार क्यों किया जा रहा है ?

यह चिंता का विषय है।

लाश को छाती से लगाए शाम तक बैठी रही अमली बाई

मृत नवजात की मौसी अमली बाई ने बताया कि

मां की मौत के बाद बच्चे की तबीयत खराब थी,

जिसे जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था

मंगलवार सुबह 8 बजे मौत के बाद सरकारी वाहन को बुलाया गया,

लेकिन सुबह से शाम तक कोई साधन नहीं मिला

वे बहुत गरीब हैं और उन्हें गांव तक पहुंचाने के लिए पैसे नहीं हैं।

इसलिए मुझे सुबह से ही बच्चे की लाश लेकर यहां बैठना पड़ा।

 

प्रसव के दौरान भी एंबुलेंस नहीं मिली

इससे पहले बच्चे की मां कलावती की डिलीवरी के दौरान भी

एंबुलेंस समय पर नहीं मिल पाती थी।

इसलिए कई तरह की दिक्कतें होती थीं।

यहां के वाहन वाले अक्सर गरीबों को अस्पताल ले

जाने की बजाय उनको कोई न

कोई बहाना बनाकर पल्ला झाड़ लेते हैं।

 

यकीन न हो तो महतारी एक्सप्रेस के प्रमुख से ही सुन लीजिए

 

महतारी एक्सप्रेस एंबुलेंस सेवा के प्रमुख राज गेहानी से

जब इस बारे में बात की गई

तो उन्होंने कहा कि मां और बच्चे को लाने ले जाने

की जिम्मेदारी सिर्फ हमारी है,

शव की नहीं । इनसे ये भी तो पूछा जा सकता है कि

आखिर मानवता भी तो कोई चीज होती है या नहीं ?

आप यही सूचना किसी शव वाहन उपलब्ध

कराने वाली संस्था को भी तो दे सकते थे ?

मेडिकल काॅलेज प्रबंधन ने कराई व्यवस्था

उधर, 1 माह से कम उम्र के नवजात के शव से परिजन बिलखते देख

मीडिया हरकत में आया और चिकित्सा अधिकारियों को

एंबुलेंस सेवा की लापरवाही के बारे में बताया।

इसके बाद मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने संबंधित

वाहन चालकों को जमकर फटकार लगाई।

तब कही जाकर आनन-फानन में मुक्तांजलि वाहन से

बच्चे के शव को उसके गांव भेजा जा सका।

बताया जा रहा है कि पिछले कई दिनों से

एंबुलेंस सेवाओं की लापरवाही लगातार सामने आ रही है ।

और इसे तरह-तरह से समझाने की कोशिश की जा रही है।

सवाल यह है कि सेवा प्रदाता

अपनी जिम्मेदारी के प्रति उदासीनता क्यों दिखा रहे हैं ?

क्या सरकार उनको इसी जिम्मेदारी के लिए पैसों का भुगतान करती है ?

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