समाज-सरकार परिपक्व व्यवहार करें

अभिषेक कुमार सिंह

इंटरनेट बैन या शटडाउन एक बड़ा मसला :
इसमें दो राय नहीं कि आज की दुनिया में इंटरनेट बैन या शटडाउन एक बड़ा मसला बन गया है। खास तौर से लोकतांत्रिक देशों में अक्सर ही यह मुद्दा चर्चा के केंद्र में आ जाता है, क्योंकि अब किसी के लिए इंटरनेट के बिना जीवन-यापन करना काफी मुश्किल होता जा रहा है।
देश में इंटरनेट पर अफवाहों के प्रसार को रोकने के मकसद से अगस्त, 2017 में केंद्र सरकार ने टेलीग्राफ एक्ट में एक अध्यादेश से संशोधन कर राज्य और सरकार को यह हक प्रदान किया था कि किसी आपात स्थिति में जनता की सुरक्षा के उद्देश्य के साथ अस्थायी तौर पर इंटरनेट शटडाउन किया जा सकता है। इससे पहले सरकारें धारा-144 के तहत ही इंटरनेट शटडाउन को जायज ठहराती रही हैं। हालांकि आरोप है कि इसका अधिकार मिलने के बाद सरकारों ने इसे राजनीतिक प्रतिरोध का जरिया भी बना लिया है, जिससे हिंसा और तनाव बढऩे का खतरा और बढ़ जाता है। सही सूचनाएं नहीं मिलने और तानाशाही का रवैया अपनाने से हिंसा और अस्थिरता आदि में और इजाफा हो जाता है। देश में, खासतौर से राजधानी दिल्ली और इसके इर्दगिर्द जारी किसान आंदोलन की स्थितियों के मद्देनजर इंटरनेट संचालन रोके जाने की घटनाओं को देखते हुए यह मुद्दा जरूरी बहस के केंद्र में आ गया है कि क्या किसी तरीके को अपनाकर इंटरनेट शटडाउन से बचा जा सकता है। निश्चित ही यह एक किस्म का कर्फ्यू है, जिसका सहारा सरकारें इधर अमन-चैन कायम करने और व्यवस्था बनाने के नाम पर लेने लगी हैं।
कोरोना काल के ऐसे दौर में कि जब पढ़ाई, खरीदारी, बैंकिंग, रिजर्वेशन, ऑनलाइन खबरें पढऩे, वीडियो-फिल्में देखने से लेकर तमाम तरह का ज्ञान इंटरनेट के जरिए बांटा और हासिल किया जा रहा हो, ऐसी स्थिति में कहीं साइबर कर्फ्यू लगा दिया जाए तो क्या हालत होती है। हालांकि देश के कुछ हिस्सों, जैसे जम्मू-कश्मीर के अशांत माने जाने वाले इलाकों में तो यह तकरीबन रोज की बात है। वहां जब-तब इंटरनेट बैन कर दिया जाता है। यहां तक कि खबरें भी रुक जाती हैं, व्हाट्सएप, गूगल जैसी सुविधाएं भी ठप पड़ जाती हैं।
सरकार की ओर से इंटरनेट स्थगित करने की घटनाएं सोशल मीडिया पर विचलित करने वाली सूचनाओं, वीडियो और फोटो को शेयर करने के साथ बढ़ रही हैं, यह अब आम लोग भी महसूस करते हैं। करीब तीन साल पहले यूनेस्को और इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स की ओर से जारी ‘साउथ एशिया प्रेस फ्रीडम रिपोर्ट 2017-18Ó पर नजर दौड़ाने से पता चलता है कि मई, 2017 से अप्रैल, 2018 के बीच की अवधि में पूरे दक्षिण एशिया में इंटरनेट शटडाउन की 97 घटनाएं रिकॉर्ड की गईं, जिनमें 82 घटनाएं अकेले भारत में हुई थीं। समान अवधि में पाकिस्तान में 12 इंटरनेट शटडाउन हुए लेकिन भारत में इंटरनेट बैन का मामला थोड़ा पेचीदा माना जाएगा क्योंकि एक लोकतांत्रिक देश के रूप में भारत की तुलना दुनिया के विकसित लोकतंत्रों से होती है।
सरकार का जवाब होता है कि जब कुछ शरारती तत्व व्हाट्सएप, फेसबुक आदि सोशल मीडिया के मंचों से अफवाहें फैलाकर समाज के कुछ वर्गों को विचलित करना चाहते हैं या कोई गलत संदेश देना चाहते हैं तो इंटरनेट शटडाउन एक ऐसा हानिरहित तरीका है, जिससे लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखा जा सकता है। जिस समाज में चोटी-कटवा का आतंक सोशल मीडिया पर सवार होकर पूरे उत्तर भारत को महीनों तक परेशान कर सकता है, जिस देश में क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद और इसी किस्म की समाज-विभाजित करने वाली अफवाहें फेसबुक-व्हाट्सएप के माध्यम से जंगल में आग की तरह फैलाई जा सकती हैं, वहां इंटरनेट शटडाउन एक जरूरी उपाय लगता है। यह कई बार साबित हुआ है कि जो सूचनाएं या खबरें सोशल मीडिया पर फैलाई गईं, उनके पीछे कुछ उपद्रवी तत्व थे और इन सूचनाओं के कारण सामाजिक सद्भाव खतरे में पड़ गया।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। जैसा कि यूनेस्को की रिपोर्ट बताती है कि सूचनाओं को बाधित करने वाले साइबर कर्फ्यू से लोगों का स्वतंत्र रूप से सूचना हासिल करने का अधिकार बाधित होता है। घर-दफ्तर के अनगिनत काम साइबर कर्फ्यू से प्रभावित होते हैं। इंटरनेट शटडाउन अब काफी ज्यादा आर्थिक नुकसान का सबब भी बन रहा है। यह नुकसान कितना है–इसका एक अनुमान हाल में एक वेब पोर्टल टॉप10वीपीएन ने लगाया है। इस पोर्टल के मुताबिक भारत को 2020 में इंटरनेट शटडाउन की वजह से लगभग 2.5 अरब बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है।
पिछले एक दशक में ही हमारे देश में वायरलेस दूरसंचार सुविधाओं का घनत्व 5 प्रतिशत से बढ़कर 85 प्रतिशत हो गया और इंटरनेट की पहुंच 50 करोड़ यूजर्स तक हो गई है। साथ ही ऑनलाइन पढ़ाई, बैंकिंग और वित्त ही नहीं, परिवहन, संचार, रक्षा और इंडस्ट्री के विभिन्न क्षेत्रों का कामकाज काफी हद तक साइबर दुनिया पर निर्भर है। ऐसे में इंटरनेट पर बैन की जो कवायदें सरकार की तरफ से हो रही हैं, उसके अपने अर्थ हैं। बेशक, इंटरनेट शटडाउन जैसी घटनाओं की अधिकता एक समाज के रूप में हमारी परिपक्वता पर भी सवाल उठाती है। पर इससे यह पता चलता है कि एक समाज के रूप में हम जागरूक नहीं हैं। हम न तो खबरों और अफवाहों में फर्क कर पाते हैं न ही अफवाहों के खुद पर असर को नियंत्रित कर पाते हैं। जिस दिन समाज यह अंतर करने में सफल हो जाएगा, इंटरनेट पर प्रतिबंधों की संख्या उतनी ही सीमित होती चली जाएगी।

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