सकारात्मक सोच, तैयारी और आत्मविश्वास से मिलेगा लक्ष्य

अपने प्रोजेक्ट या कामकाज को एक नई ऊंचाई पर ले जाने के कई विचार आपके मन में भी आते होंगे। लेकिन अपने वरिष्ठों से कहने में हिचकिचाहट होती है।
हो सकता है आपने हाल ही में अपना करियर शुरू किया हो या अच्छे पद पर हों, फिर भी कभी-कभी इस उलझन में घिर जाते हों कि क्या मैं जब अपना नजरिया अपने सीनियर, कस्टमर या किसी सहकर्मी के सामने रखूंगा, तो वह तर्कपूर्ण लगेगा? क्या वह दूसरों को जंचेगा? इस हिचकिचाहट को दूर करने के लिए पहले लोगों के मन में जमे कुछ सामान्य डरों पर चर्चा कर लेते हैं। जैसे :
– मेरे सीनियर या अधिकारी इस समय सही मूड में होंगे या नहीं?
– अगर मैं उन्हें समझा नहीं पाया तो?
– मेरा नजरिया या आइडिया हो सकता है कि खारिज कर दिया जाए।
– मैं उनके प्रश्नों के सही उत्तर न दे पाया तो?
– दूसरों को वह आइडिया मिल जाएगा, फिर वे उसे बेहतर ढंग से प्रस्तुत कर देंगे।
– मुझे बातचीत का सही तरीका नहीं आता।
– घबराहट के कारण रिपोर्ट की प्रेजेंटेशन ही गड़बड़ा न जाए।
– हो सकता है कि मैं नियत समय से ज्यादा टाइम ले लूं।
– हो सकता है कि मेरे बॉस मुझसे नाराज हो जाएं।
इस डर को कैसे संभालें
– जब भी आपके दिमाग में इस तरह की शंकाएं आएं, तो खुद से पूछें कि ‘अगर मैं जो सोच रहा हूं, वह सब काल्पनिक बात ही हुई तो?’ इसलिए इसके होने की और न होने की संभावना 50-50 फीसदी है। जब आप अपने डर पर इतना सोचेंगे, तो इस प्रक्रिया में आप 50 फीसदी आशंका वाला हिस्सा हटा चुके होंगे, क्योंकि आप अपने डर को एक तर्क से पूरी तरह निराधार साबित कर चुके होंगे। अब जो 50 फीसदी की सकारात्मक संभावनाएं बची हैं, उसे अपने हाथ में लेना सीखिए।
इसे संभालने का सही तरीका है कि आप अपनी बातचीत, या प्रेजेंटेशन की तैयारी पर फोकस कीजिए। एक बार आप इसे लिख लेंगे, तो न सिर्फ अपने विचार के बारे में ज्यादा स्पष्ट हो जाएंगे, बल्कि आपका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। आपके डर का एक ही समाधान है-आपकी तैयारी और आत्मविश्वास। फिर भी मेरी राय यही है कि आप जब सोचें, तो अपनी सोच को लिखित रूप से व्यवस्थित करें।
दमदार संवाद आगे बढ़ने के लिए बहुत जरूरी है। संवाद में आत्मविश्वास और दूसरों के लिए सम्मान की भावना भी होनी चाहिए। किसी भी तरह की प्रस्तुति के लिए इस तरह की संवाद कला का होना अनिवार्य है। अपनी बात को कितनी अच्छी तरह आप दूसरों के सामने रखते हैं, इसी से बात बन जाती है। एसर्टिव कम्यूनिकेशन का यह सिद्धांत समझ लें। इसका उन जगहों पर पहले अभ्यास कर लें, जहां नुकसान होने का खतरा कम से कम हो। फिर इसे उन जगहों पर अमल में लाएं, जहां आपको अपना विचार पुरजोर तरीके से रखना है, ताकि लोगों का ध्यान उस पर जाए।

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