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Sunday, September 25, 2022

farmers flora किसानों के लिए बनेंगी वरदान

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flora farmers खुशखबरी !अब खेत में ही बनेगी खाद बढ़ेगी उर्वरा शक्ति, बढ़ेगा उत्पादन

राजकुमार मल

भाटापारा- flora उर्वरक की खरीदी भले ही जरूरी हो लेकिन यह काम अर्थ और समय के नुकसान की बड़ी वजह बन रही है।

इसलिए जो farmers विकल्प की तलाश में हैं,

उनके लिये खुशखबरी, नई विधि से खेतों में ही ऐसी नैसर्गिक खाद बनाई जा सकेगी,

जिनसे उत्पादन तो बढ़ेगा ही, साथ ही भूमि की उर्वरा शक्ति भी बढ़ाई जा सकेगी।

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farmers सनई,ढेंचा और जंगली नील सहित चार अन्य वनस्पतियां हरी खाद के रूप में बहुत जल्द खेतों में पहुंचने की तैयारी में हैं।

बेहद अल्प खर्च और अल्प समय में तैयार होने वाली यह flora उन किसानों के लिए वरदान बनेंगी,

जो हर बरस रासायनिक उर्वरक की बढ़ती कीमत से हलाकान हो चुके हैं।

ताजा स्थितियां जैसी बनती नजर आ रहीं हैं,

उसके बाद यह flora हरी खाद के रूप में प्रदेश के खेतों में पहुंचने के लिए तैयार है।

ये हैं हमारी हरी खाद

सनई,ढेंचा, लोबिया, जंगली नील, ग्वार, मूंग और उड़द। इसकी फसल से हरी खाद तैयार होगी।

40 से 50 दिन में तैयार होने वाली इनकी फसलें, कम्पोस्ट,

वर्मी कम्पोस्ट, गोबर खाद और रासायनिक खाद का बेहतर और प्राकृतिक विकल्प मानी जा चुकी है।

सूखा सहनशील यह फसलें वर्षा ऋतु के प्रारंभ होते ही बोई जा सकती हैं।

मानक उम्र में पहुंचने के बाद रोटावेटर चलाकर पलट दिए जाने से हरी खाद तैयार हो जाती है।

यदि दूसरे खेत में ले जानी हो, तो इन फसलों को तीन से चार बार काटा जाकर भी यह काम किया जा सकता है।

देश में यह प्रदेश

अपने देश में पंजाब और महाराष्ट्र ऐसे प्रदेश हैं जो सबसे ज्यादा पांच प्रजाति की हरी खाद न केवल तैयार कर रहे हैं बल्कि उपयोग भी बढ़ा रहे हैं।

महाराष्ट्र में कुल्थी, नाईजर,ढेंचा, सनई और जंगली नील जैसी हरी खाद के उपयोग से न केवल

फल और सब्जियों की सफल खेती हो रही है तो दलहन का रिकॉर्ड उत्पादन भी हासिल किया जा रहा है।

पंजाब प्रांत सनई, ढेंचा, ग्वार, बरसीम और क्लस्टर बीज जैसे हरी खाद का प्रयोग करके देश में गेहूं, चांवल और सरसों की रिकॉर्ड उत्पादन देने वाला प्रांत बना हुआ है।

केरल,मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, हरियाणा, कश्मीर और कर्नाटक भी अब ऐसे राज्य बन चुके हैं जहां तेजी से हरी खाद का उपयोग बढ़ रहा है।

होते हैं यह लाभ

हरी खाद के उपयोग से जिन लाभ की जानकारियां मिट्टी वैज्ञानिकों ने साझा की है,उसके अनुसार इसकी मदद से मिट्टी की सतह पर पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाई जा सकती है,नाईट्रोजन की कमी भी दूर होती है।

इसका लाभ मुख्य फसलों की बढ़ती उत्पादकता के रूप में मिलती है।

साथ ही अगली फसल के ग्रोथ में भी मदद मिलती है।

हरी खाद का सबसे ज्यादा लाभ, रेतीली और चिकनी मिट्टी की संरचना में सुधार के रूप में भी देखने को मिले हैं।

इसके अलावा इसमें मिट्टी के पी एच मान को नियंत्रित करने के भी गुण मिले हैं।

घास की यह प्रजातियां बदलते समय में रासायनिक खाद की बेहतर विकल्प हैं।

डी-कंपोज होने के बाद यह बेहतर परिणाम देने में सक्षम हैं।

-डा. युष्मा साव,असि. प्रोफेसर, टी सी बी कॉलेज ऑफ एग्री एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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